Friday, 27 July 2018

सिखों ने चंदा लगाकर कराई थी इस दरगाह की मरम्मत,आज भी सिख ही करते हैं देखरेख


जब आप आस्था से जुड़ी इस कहानी के बारे में पढ़ेंगे तो आपको भी गर्व महसूस होगा।ये कहानी एक ऐसे दरगाह की है जिसका इतिहास बहुत पुराना है।

स्थानीय लोग बताते हैं कि यह दरगाह उस समय की है जब यहाँ मुग़ल बादशाह जहांगीर की हुकूमत थी।स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि ये दरगाह 1640 से 1670 के बीच बनायी गयी थी।इसी इलाक़े में मुग़ल बादशाह जहांगीर की आरामगाह भी हुआ करती थी जहां वो अपने प्रवासों के दौरान ठहरा करते थे।

हज़रत खिज़्मत अली शाह और हज़रत इज़मत अली शाह के बारे में स्थानीय लोग बताते हैं कि ये उसी दौर में आये थे। कहाँ से आये थे किसी को पता नहीं। लेकिन इन दोनों सूफ़ी संतों की दरगाह भी उसे दौर की है जिसका निर्माण भी मुग़लों के दौर में ही हुआ था।

राजाताल के लोग बताते हैं कि 1947 के आस पास ये दरगाह बहुत बुरे हाल में हुआ करती थी। भवन खंडहर हो चुका था और पीरों की क़ब्रें भी बुरे हाल में ही थीं। बंटवारे के बाद, यानी मुसलामानों के जाने के बाद, यहाँ के सिखों ने आपस में चंदा कर दरगाह का सौन्दर्यकरण किया।राजाताल के बुज़ुर्ग सुब्बा सिंह कहते हैं कि पुश्त दर पुश्त सिखों की आस्था हज़रत खिज़्मत अली शाह और हज़रत इज़मत अली शाह की दरगाह से जुड़ी हुई है।वो कहते हैं कि बंटवारे के बाद भी सरहद के उस पार से मुसलमान इस दरगाह पर आया करते थे और चादर चढ़ाया करते थे।

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