Friday, 3 August 2018

76 साल की आशा पारेख और 80 की वहीदा रहमान का जादू अब भी कायम, देखें


बुधवार को मुंबई में अनिल कपूर, राजकुमार राव, ऐश्वर्या राय बच्चन की आने वाले फ़िल्म ‘फन्ने ख़ान’ की स्क्रीनिंग रखी गयी थी। इस मौके पर जब गोल्डन एरा की दो दिग्गज अभिनेत्रियां आशा पारेख और वहीदा रहमान पहुंची तो यह वहां मौजूद लोगों के लिए एक बेहद ही स्पेशल मौका बन गया। कभी अपनी खूबसूरती से दुनिया का दिल जीतने वाली इन दो अभिनेत्रियां पर अब उम्र का असर साफ़ दिखता है लेकिन, तस्वीरें बता रही हैं कि इनका जादू आज भी कायम है!

आशा पारेख और वहीदा रहमान इन दोनों अभिनेत्रियों ने अपनी-अपनी फ़िल्मों के जरिये एक मजबूत पहचान उस वक़्त बनाई थी जब एक से बढ़कर एक दिग्गज एक्टर्स सक्रिय थे। आशा पारेख के बारे में आपको याद दिला दें कि 1959 से 1973 के बीच वो हिंदी फ़िल्मों की टॉप अभिनेत्रियों में शुमार रही हैं। ‘कटी पतंग’ के लिए इन्हें बेस्ट अभिनेत्री का फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला 1972 में और फ़िल्मों में योगदान के लिए फ़िल्मफेयर का ही लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड 2002 में मिला।

 इनके योगदान के लिए आइफा ने भी 2006 में स्पेशल पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्होंने अपने समय के सभी प्रसिद्ध तथा सफल नायकों जैसे देव आनंद, गुरुदत्त, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त, धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना, मनोज कुमार आदि के साथ काम किया। आशा पारेख ने हिंदी के अलावा गुजराती, पंजाबी और कन्नड़ फ़िल्मों में भी काम किया। उनकी गुजराती फ़िल्म 'अखंड सौभाग्यवती' को अपार सफलता मिली। ‘फन्ने ख़ान’ की स्क्रीनिंग के दौरान आशा पारेख और वहीदा रहमान कुछ इस अंदाज़ में कैमरे में कैद हुईं। आप देख सकते हैं दोनों इस मौके पर काफी सोबर लग रही हैं और उम्र के इस पड़ाव पर भी इनका चार्म बरकरार है।

 साल 1990 में गुजराती टीवी सीरियल 'ज्योति' का निर्देशन कर आशा पारेख ने छोटे पर्दे की दुनिया में कदम रखा। उसके बाद अपनी प्रोडक्शन कंपनी आकृति खोलकर 'पलाश के फूल', 'बाजे पायल', 'कोरा कागज', 'दाल में काला' सीरियल बनाए। क्या आप जानते हैं आशा बॉलीवुड की उन एक्ट्रेसेस में से एक हैं जिन्होंने शादी नहीं की। फ़िल्मों के अलावा आशा पारेख फ़िल्मों से जुड़े कई महत्वपूर्ण पदों पर भी रहीं। 1994 से 2000 तक सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की अध्यक्ष रहीं। साथ ही सेंसर बोर्ड की पहली महिला अध्यक्ष बनने का गौरव भी इन्हें ही हासिल है। साल 1992 में कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए वह पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित की गईं।

जबकि वहीदा रहमान की बात करें तो उर्दू शब्द 'वहीदा' का अर्थ लाजवाब ही होता है। इसी साल फरवरी में उन्होंने अपना 80 वां जन्मदिन सेलिब्रेट किया है। बॉलीवुड में उन्हें पहली फ़िल्म ‘सीआईडी’ में खलनायिका का किरदार मिला। सीआईडी की कामयाबी के बाद फ़िल्म ‘प्यासा’ में वहीदा रहमान को नायिका के रूप में लिया गया।

 ‘प्यासा’ के बाद गुरुदत्त और वहीदा रहमान ‘कागज के फूल’, ‘चौदहवीं का चांद’ और ‘साहब बीवी और गुलाम’ में भी साथ नज़र आये। नेशनल अवार्ड विनिंग फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ में राज कपूर के साथ वहीदा ने जो हीराबाई का किरदार निभाया था, उसे भला कौन भूल सकता है? ‘गाइड’ और ‘नीलकमल’ भी उनके कैरियर की यादगार फ़िल्मों में शुमार है। इन दोनों ही फ़िल्मों के लिए उन्होंने फ़िल्मफेयर से बेस्ट एक्ट्रेस अभिनेत्री का अवार्ड जीता। ‘फन्ने ख़ान’ की स्क्रीनिंग के दौरान दोनों की मौजूदगी ने अलग ही रंग भरा।

साल 1974 में वहीदा के सामने अभिनेता कंवलजीत ने शादी का प्रस्ताव रखा और फिर दोनों शादी के बंधन में बंध गये। गौरतलब है कि साल 2002 में उनके पति का आकस्मिक निधन हो गया। हाल के वर्षों में वहीदा 2006 ‘रंग दे बसंती’ के बाद ‘पार्क एवेन्यू’, ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘ओम जय जगदीश’ जैसी फ़िल्मों में नज़र आ चुकी हैं। वहीदा को उनके शानदार अभिनय के लिए 1972 में पद्मश्री और 2011 में पद्मभूषण अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।


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