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Thursday, 18 October 2018

प्रेस के बिना इस ट्रिक से मिनटों में दूर होंगी कपड़ों की सिलवटें


अगर आप भी उन लोगों में से एक हैं जिनके पास वक्त की बहुत कमी होती है, तो आपके लिए एक अच्छी खबर है. अगर आपके लिए भी कपड़े प्रेस कराना एक सिरदर्द है तो एक आसान सी ट्रिक से आपका काम बन जाएगा.

इसमें ना तो आयरन की जरूरत होगी और ना ही पैसा खर्च होगा. अगर कभी प्रेस खराब हो जाए तो भी आप इस ट्रिक का इस्तेमाल कर सकते हैं.

आपको अपने ड्रायर में 2-3 आइस क्यूब डालने होंगे और कुछ मिनट के लिए गर्म होने देना है,  फिर आपके कपड़ों की सिकुड़न बिल्कुल गायब हो जाएगी.

ड्रायर से निकालने के बाद कपड़ों को सीधे हैंगर में टांग दें ताकि कपड़ों में सिलवटें फिर से न आएं या तुरंत उसे पहन लें. अगर ड्रायर के रुकने के बाद भी लंबे समय तक आप कपड़ों को उसी में छोड़ देते हैं या कपड़ों की टोकरी में ढेर लगा देते हैं, तो कपड़ों में सिलवटें फिर से आ सकती हैं.

कई लोगों ने इस ट्रिक को आजमाया है और इसके नतीजों से संतुष्ट भी हैं.

लेकिन ये ट्रिक काम कैसे करती है? आइए जानते हैं आखिर ये जादू काम कैसे करता है?

हीट से ड्रायर में बर्फ पिघलती है और उसके बाद पानी और स्टीम में बदलती है यानी ये बिल्कुल वैसा ही काम करता है जो आपका आयरन करता है.

ड्रायर आपके कपड़ों को स्टीम कर देता है जिससे कपड़ों की सिकुड़न मिट जाती है.

लोगों ने ऑनलाइन ये भी सलाह दी है कि आप ड्रायर को आइस क्यूब से ज्यादा ना भर दें.

दो-तीन शर्ट्स या एक शर्ट और ट्राउजर्स की सिकुड़न मिटाने के लिए यह अच्छा विकल्प है. वैसे इसके अलावा भी आप कई ट्रिक आजमा सकते हैं जिससे आपको आयरन की जरूरत नहीं पड़ेगी. आप ड्रायर से कपड़ों को निकालने के तुरंत बाद उन्हें टांग दें.

कई और क्लीनिंग एक्सपर्ट का कहना है कि लॉन्ड्री में नमक के इस्तेमाल से कपड़ों का रंग वाइब्रेंट रखता है.

कपड़ों को ड्रायर से निकालने के बाद ज्यादातर लोग उसी तरह रस्सी पर टांग देते हैं. यह गलत तरीका है. कपड़ों को दोनों हाथों से पकड़कर झटके और फिर रस्सी पर डालें. इसके अलावा अगर शर्ट या फिर कुर्ते हैं तो उन्हें हैंगर में टांगना ज्यादा बेहतर होगा.


जिन कामों के लिए सांपों के ज़हर हैं रामबाण


ज़हर जान ले लेता है. हम सब ये बात जानते हैं. इसके ख़तरों से वाकिफ़ हैं.

पर, अगर हम ये कहें कि ज़हर से जान बचाई जा सकती है, तो क्या आप यक़ीन करेंगे ?

ज़हर के जानकार डॉक्टर ज़ोल्टन टकास कहते हैं कि, 'ज़हर दुनिया में इकलौती क़ुदरती चीज़ है, जो विकास की प्रक्रिया से उपजी है जान लेने के लिए.'

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में मेडिसिन एक्सपर्ट डेविड वॉरेल ने 2015 में लिखा था कि दुनिया भर में हर साल दो लाख से ज़्यादा लोग सांप के काटने से मर जाते हैं.

इस ज़हर की काट खोजने का काम जारी है. ये लंबी प्रक्रिया है. मज़े की बात ये है कि ज़हर की काट तलाशने में जुटे वैज्ञानिकों को इस ज़हर में ही कई बीमारियों का तोड़ मिलता दिखने लगा.

बल्कि, दुनिया में ज़हर से तैयार कई दवाएं तो पहले से ही बिक रही हैं. दुनिया में कम से कम चार ऐसे जीव हैं, जिनका ज़हर इंसान के काम आ रहा है.

सांप

दुनिया में सांपों की जितनी नस्लें हैं, उतने ही तरह के ज़हर. किसी के काटने से तुरंत मौत हो जाती है. तो, किसी का ज़हर तड़पा कर मारता है.

ज़्यादातर सांप अपने विषैले दांतों से ज़हरबुझा हमला करते हैं. जब शिकार के बदन पर सांप के विषैले दांत घुस जाते हैं, तो ज़हर सीधे शिकार के ख़ून में समा जाता है.

कुछेक सांप ऐसे भी होते हैं, जो थूक कर ज़हर फेंकते हैं. अफ्रीकी देश मोज़ांबिक में पाया जाने वाला स्पिटिंग कोब्रा ऐसा ही सांप है.

अब सांप के ज़हर की इतनी वेराइटी है, तो ज़ाहिर है, उनके फ़ायदे भी कई तरह के होंगे. सांप के ज़हर से ऐसी दवाएं बनाई जाती हैं, जो दिल की बीमारियों से लड़ने में काम आती हैं.

टकास कहते हैं कि. 'सांप के ज़हर का दवाएं बनाने में इस्तेमाल, दूसरे क़ुदरती ज़हर के इस्तेमाल का रास्ता दिखाता है. ख़ास तौर से हाई ब्लड प्रेशर से लड़ने में सांप के ज़हर से बनी दवाएं काफ़ी इस्तेमाल हो रही हैं. दिल के दौरे और हार्ट फेल होने की स्थिति में भी सांप के ज़हर से बनी दवाएं बहुत कारगर हैं.'

टकास बताते हैं कि, 'जराराका पिट वाइपर सांप के ज़हर से बनी दवाओं ने जितने इंसानों की जानें बचाई हैं, उतनी किसी और जानवर ने नहीं.'

कोमोडो ड्रैगन

इस ड्रैगन की ज़हर की ग्रंथि, सांप के मुक़ाबले दूसरी तरह से काम करती है. ये जानवर अपनी तमाम ग्रंथियों से ज़हर खींचकर अपने दांतों से शिकार के शरीर में घुसा देता है.

इसका ज़हर जब किसी शिकार के ख़ून में मिलता है, तो ख़ून जमता नहीं है. वो पूरे शरीर में फ़ैल जाता है.

यही वजह है कि कोमोडो ड्रैगन के शिकार के शरीर से लगातार ख़ून बहता रहता है. वैसे तो ये ख़तरनाक शिकारी है. मगर, इसके ज़हर में जो ख़ून को न जमने देने वाला गुण है, उसका फ़ायदा दवाएं बनाने में लिया जाता है.

जब दिल के दौरे पड़ते हैं. या फेफड़ों में ऐंठन होती है, तो हमारे शरीर में ख़ून रुकने लगता है. कोमोडो ड्रैगन के ज़हर की मदद से इससे राहत देने वाली दवा तैयार होती है, ताकि ख़ून के थक्के न बनें.

बिच्छू

दुनिया में हर साल कम से कम 12 लाख लोग बिच्छू के डंक के शिकार होते हैं. बिच्छू के डंक मारने से हर साल तीन हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत होती है. सबसे ख़तरनाक बिच्छू डेथस्टाकर स्कॉर्पियन कहा जाता है.

लेकिन, ये कैंसर के इलाज में अहम रोल निभा सकता है. इसके ख़तरनाक ज़हर में क्लोरोटॉक्सिन नाम के ज़हरीला तत्व होता है. इससे कैंसर का पता लगाया जा सकता है. और इससे कैंसर के ट्यूमर ठीक किए जा सकते हैं.

छछूंदर

यूं तो स्तनधारी जानवर ज़हरीले नहीं होते, लेकिन छछूंदर की कुछ नस्लों में ज़हर होता है. वैसे, ये ज़हर भी बहुत ख़तरनाक नहीं होता. इससे कोई इंसान मरता तो नहीं. मगर, छछूंदर के ज़हर से दर्द और सूजन आ जाती है.

भले ही इसके ज़हर की बहुत चर्चा नहीं होती. मगर, वैज्ञानिकों ने छछूंदर के ज़हर में दिलचस्पी दिखाई है. इस बात की पड़ताल की जा रही है कि छछूंदर के ज़हर से कैंसर का इलाज किया जा सकता है क्या?

जानकार कहते हैं कि ज़हर, इंसान के शरीर में जिन केमिकल को निशाना बनाता है, वो ट्यूमर में पाये जाते हैं. इसलिए ज़हर की इस ख़ूबी का फ़ायदा उठाकर ट्यूमर को ख़त्म करने वाली दवाएं बनाने में करने की कोशिश हो रही है.

ऐसा हुआ, तो ज़हर से जान नहीं जाएगी. तब ज़हर जीवनदान देगा.


दोस्त के घर से ये क्या उठा लाया शख्स, सच्चाई आई सामने तो हो गया हैरान


अगर आप भी पशु प्रेमी हैं तो आप ये खबर पूरी पढ़िए क्योंकि ये आपके काम की है। आज हम आपको बता रहे हैं एक ऐसी हैरान करने वाली कहानी जिसे सुनकर आप दंग रह जाएंगे। दरअसल एक शख्स अपने दोस्त के यहां मिलने गया। वहां शख्स की नजर दरवाजे पर एक कुत्ते की तरह दिखने वाले जानवर पर पड़ती है। वह कुछ समझ पाता कि वह अपने दोस्त से तुरंत बोल बैठा यार ये मुझे दे दो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। दोस्त ने भी कह दिया ले जाओ मेरे दोस्त।

आपको बता दें कि यह मामला चाइना का है, जो सोशल मीडिया में काफी वायरल हो रहा है। क्योंकि उस अनजान शख्स ने पूरी कहानी खुद ब्लॉग लिखकर लोगों से साझा की है। अनजान शख्स ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि वह कुत्ता समझ कर एक जानवर को अपने घर ले आया लेकिन जब गौर से देखा तो पता चला कि वह चूहा है।

हजारों लोग तो उसका ब्लॉग खबर पढ़कर सिर खुजाने पर मजबूर हो गए कि कोई कैसे इतनी बड़ी गलती कर सकता है। ब्लॉग पोस्ट के मुताबिक, पिछले सितंबर महिने में वह अपने एक दोस्त के घर गया था, जहां उसे काले रंग का कुत्ता घर के दरवाजे पर दिखा, लेकिन उस समय काफी अंधेरा था और मेरा दोस्त ठीक से नहीं देख पाए थे।

उन्होंने उस जानवर को गोद लेने के बारे में सोच लिया। कुछ समय बीतने के बाद शख्स को शक हुआ कि उसके शरीर के बाल नहीं बढ़ रहे थे और वो कुत्तों की तरह भाग भी नहीं रहा था। जिसके बाद उन्होंने ब्लॉग लिखा और जानवर की तस्वीरें डालकर लोगों से पूछा कि ये कौन सा जानवर है। जिसका जवाब उन्हें कुछ ही देर में मिल गया।

यूजर्स ने बताया कि ये एक चूहा है जिसको बैंबू रेट बुलाया जाता है। चीन की एक मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद शख्स ने चूहे को दूर छोड़ आना ही उचित समझा, क्योंकि उसे पता नहीं था कि उसकी देख-रेख कैसे की जाए। सोशल मीडिया पर ये घटना वायरल हो गई और दो दिन बाद ही लोकल वेबसाइट ने इस खबर को जारी किया है।





हथिनी का धूमधाम से मनाया जन्मदिन, काटा 50 किलो का केक


अब तक आपने इंसान और बच्चों को जन्मदिन मनाते और उस मौके पर केक काटते देखा और सुना होगा। लेकिन बिहार के समस्तीपुर में ऐसे भी पशुप्रेमी हैं, जिन्होंने न केवल अपनी हथिनी का धूमधाम से जन्मदिन मनाया, बल्कि हथिनी ने भी अपने जन्मदिन पर तलवार से 50 किलोग्राम का केक काट खुशियां मनाई। इस मौके पर बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी सहित कई पशुप्रेमी मौजूद थे।

समस्तीपुर के मथुरापुर निवासी महेंद्र प्रधान की पहचान इस क्षेत्र में न केवल पशुप्रेमी के रूप में है, बल्कि उन्हें तरह-तरह के जानवरों को पालने का शौक भी है। इसी शौक के कारण उनकी पशुशाला में हाथी, घोड़े, ऊंट, गाय, बैल सहित कई जानवर और पक्षी मौजूद हैं।

प्रधान ने रविवार शाम अपनी आठ वर्षीय हथिनी रानी का आठवां जन्मदिन धूमधाम और भव्य तरीके से साथ मनाया। रानी ने भी अपने जन्मदिन पर अपनी सूढ़ में तलवार पकड़कर 50 किलोग्राम का केक काटा। इस मौके पर गाजे-बाजे, ऊंट और घोड़े बुलाए गए थे।

इस अनोखे पशु प्रेम को देखने के लिए बिहार विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी के साथ सैकड़ों स्कूली बच्चे और स्थानीय लोग मौजूद थे। इस समारोह में भाग लेने वाले भी रानी के लिए जन्मदिन के उपहार लेकर पहुंचे थे। इस जन्मदिन समारोह में पहुंचे विधानसभा अध्यक्ष विजय चौधरी ने कहा कि आज के व्यस्त जीवन में लोग अपने परिजनों तक का जन्मदिन मनाना भूल जाते हैं, लेकिन प्रधान जी ने अपनी हथिनी का जन्मदिन मनाकर यह साबित कर दिया कि वह पशुओं से कितना प्रेम करते हैं।

इस मौके पर बड़ी संख्या में आसपास के स्कूली बच्चों को भी समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। प्रशिक्षित हथिनी रानी के केक काटने के बाद बच्चों ने भी उसके साथ जमकर मस्ती की। इस अवसर पर भोज का भी आयोजन किया गया।

प्रधान ने आईएएनएस को बताया है कि वर्ष 2011 में माला नामक एक हथिनी उपहार स्वरूप उन्हें मिली थी, और वह गर्भवती थी। कुछ महीनों बाद उसने एक हथिनी को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने रानी रखा। रानी के जन्म के छह महीने बाद ही उसकी मां की मौत हो गई।

उन्होंने कहा कि रानी को उन्होंने अपने बच्चों की तरह पाला है। उनका कहना है कि इसे बचपन में चार गायों के दूध पिलाया जाता था।

प्रधान द्वारा किसी हथिनी के जन्मदिन पर इस तरह के समारोह के आयोजन की हर ओर चर्चा है, तथा इस अनोखे समारोह में शामिल लोगों ने प्रधान के इस पशु प्रेम की सराहना की है।

समारोह में भाग लेने पहुंचे समस्तीपुर के वरिष्ठ पत्रकार विभूति कुमार कहते हैं, "पशु के प्रति ऐसा स्नेह, प्रेम और संवेदना पहले कभी देखने को नहीं मिला। यह सराहनीय है। लोगों को इससे प्रेरणा मिलेगी कि इंसानों के साथ-साथ जानवरों के लिए लोग सोचेंगे।"

जन्मदिन समारोह में भाग लेने पहुंचे लोगों का कहना है कि महेंद्र प्रधान का यह पशु प्रेम समाज के लिए एक मिसाल है। रानी समस्तीपुर का गौरव है।

स्कूल ग्राउंड के नीचे मिला रहस्यमयी तहखाना, अंदर रास्ता था तंग जो गया वो रह गया दंग


दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1940 के दशक में जर्मन के ब्रिस्टल में हवाई हमलों से बच्चों को बचाने के लिए अंडरग्राउंड एयर रेड सुरंग बनाई जाती थी। ब्रिस्टल के प्राथमिक विद्यालय के नीचे बनाई गई सुरंग की दीवारों में बच्चों के द्वारा उकेरा गया अपना दर्द सबको आश्चर्यचकित कर देता है।

सुरंग में कहीं किसी बच्चे ने किसी के लिए कविता तो किसी ने अपना घर बना डाला है। बनाई गई तरह-तरह की आकृतियों को जब देखा गया तो सब हैरान हो गए। बताया जाता है कि 1940 के दशक में जब दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था तब जर्मनी ने स्कूल में बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐसी बंकरनुमा सुरंगें बना रखी थी, जिससे हवाई हमलों के दौरान बच्चों को बचाया जा सके। 

सुरंग की दीवारों में तरह-तरह की डिजाइन, जीव-जंतुओं के चित्र, लिखी हुई कविताएं आज भी दिखाई देती हैं। एक आकृति में एक बच्चा लिखता है 'पामेला मेरे साथ जाता है', एक तस्वीर के साथ एक और कहता है कि लड़की रो रही है, लड़का मुक्केबाजी कर रहा है।

बनाए गए चित्रों से पता चलता है कि हमले के समय भयभीत बच्चों ने क्या कुछ सहा होगा। दीवार में बनाए गए एक ऐसे ही चित्र में बच्चे ने लिखा है रमीला मेरे साथ चला जाता है।

सुरंग में बच्चों के द्वारा बनाए गए चित्र को ध्यान से देखते कर्मचारी। अब ब्रिस्टेल के हिलक्रिस्ट प्राइमरी स्कूल के खेल के मैदान के नीचे सुरंगों को असुरक्षित घोषित किया गया है और इन्हें भरने का काम जारी है ताकि आगे चलकर बच्चों को किसी तरह की कोई दिक्कत न हो।

खौफ के मारे एक बच्चे ने सुरंग की दीवारों में गाउन पहने हुए एक प्रभावशाली महिला को बनाया है। न जाने उस वक्त उसके मन में क्या चल रहा होगा। बताया जाता है कि स्कूल प्रबंधन भी इन बंकरनुमा सुरंगों को लेकर काफी चिंतित है।

एक बच्चे ने कविता के माध्यम से अपना दर्द लिखा है कि 'बिल्ली चटाई पर बैठी और कुछ चमगादड़ खाया, लड़की रो रही है, लड़का मुक्केबाजी कर रहा है।' कहा जा रहा है कि स्कूल में पाई गई इस बंकरनुमा सुरंग को बनाने में सीमेंट और लोहे की चादरों का इस्तेमाल किया गया है। बच्चों ने जगह-जगह खेल की भी डिजाइन बनाई हुई है।